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Showing posts from August, 2020

ये जीवन है.........

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 *||श्री नाकोडा़जी||* मेरे *शब्द* ही मेरी *पहचान* है मेरा *अनुभव* ही विचारों का *आदान प्रदान* है जो कह दिया वह *भाव* थे ; जो नहीं कह सके वो *मौन* था ।। और, जो कहना है मगर ; कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।। *जिंदगी* का क्या है ? आ कर दो पल *शकुन* से बैठे भी नही , और चल दिए ।। रिश्तो की डोर *कच्ची* होती है..... कभी *धूप* तो कभी *छाँव* क्यों न हम, *सूरज* से; रिश्ते निभाना सीखें । रिश्तों को निभाने के लिए, कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*, और कभी *बहरा* ; होना ही पड़ता है ।। *बरसात* गिरी और *कानों* में इतना कह गई कि....... *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती ।। *नसीहत*, *नर्म लहजे* में ही अच्छी लगती है । क्योंकि, *शब्दो का मकसद*, *सुलझाना* भी होता है; *उलझाना* नहीं । कहते हैं.... थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना । मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, *अपनों के बिना* *संगी* य...

मैं किससे दोस्ती करूँ

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *सूरज में आग है* *चंदा में दाग है* *तारों में विराग है* , *मैं किससे दोस्ती करूँ* *ग्रीष्म में तपन है,* *शीत में कम्पन है* *वर्षा में अनबन है,* *मैं किससे दोस्ती करूँ।* *पवन में आक्रोश है,* *वन प्रान्त मदहोश है* *बादलों में जोश है,* *मैं किससे दोस्ती करूँ।* *संसार में भोग है,* *काया में रोग है* *स्वार्थी सब लोग हैं* *मैं किससे दोस्ती करूँ* *अब तो यही निष्कर्ष निकाला है* *आत्मा ही शरण है* *मोह माया मरण है*। *निज स्वरूप अपना है* *बाकि सब सपना है* *आतम ही परम हैं* *करुणा ही धरम है* *स्व ही अर्हम है* *शास्त्रों का मरम(मर्म) हैं* *संगी क्यों ना स्व से स्व की दोस्ती करूँ* 🌹 *संगीता बागरेचा (संगी)*🌹