ये जीवन है.........
*||श्री नाकोडा़जी||* मेरे *शब्द* ही मेरी *पहचान* है मेरा *अनुभव* ही विचारों का *आदान प्रदान* है जो कह दिया वह *भाव* थे ; जो नहीं कह सके वो *मौन* था ।। और, जो कहना है मगर ; कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।। *जिंदगी* का क्या है ? आ कर दो पल *शकुन* से बैठे भी नही , और चल दिए ।। रिश्तो की डोर *कच्ची* होती है..... कभी *धूप* तो कभी *छाँव* क्यों न हम, *सूरज* से; रिश्ते निभाना सीखें । रिश्तों को निभाने के लिए, कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*, और कभी *बहरा* ; होना ही पड़ता है ।। *बरसात* गिरी और *कानों* में इतना कह गई कि....... *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती ।। *नसीहत*, *नर्म लहजे* में ही अच्छी लगती है । क्योंकि, *शब्दो का मकसद*, *सुलझाना* भी होता है; *उलझाना* नहीं । कहते हैं.... थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना । मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, *अपनों के बिना* *संगी* य...