*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *सोचो,समझो और जागो* *🍁धर्म से सुख और अधर्म से दुःख*यह शास्त्रीय वचन है तो फिर *वर्तमान मे कई धर्मी व्यक्ति भी दुखी क्यों दिखाई देते है?* ................. 🔹 *सुख-दुःख दोनों मे जीव स्वयंभू है।* *🔹धर्म का प्रत्यक्ष फल सुख नहीं हैं, बल्कि धर्म करने से पुण्य का बंध होता है और उस पुण्य के उदय से सुख की प्राप्ति होती है।उसी प्रकार अधर्म से तत्काल दुःख की प्राप्ति न होकरअधर्म से पाप का बंध होता हैं और उस पाप कर्म के उदय से दुःख की प्राप्ति होती है।* *🔹कर्म बंध के साथ ही उसकी स्थिति का भी बंध होता है वह कर्म अबाधा काल पुर्ण होने बाद ही उदय में आता हैं ।और अंतत जैसा हमारे कर्मों का बंध होता है वैसा ही फल हमे मिलता है।* 🔹 *जीव को अपने कर्म का रस चखना ही पडता है।* *🔹संसार में रहकर सब धन या जन से समान नहीं रह सकते है,*क्योंकि सबके कार्य पृथक-पृथक है सबकी भावना भिन्न-भिन्न तदनुरूप उनके कर्म का बंध होता है और उसका फल उनको अवश्य भोगना पडता है।* इसको हम इस उदाहरण से भी समझ सकते है कि-* 🔹एक ही...
Posts
Showing posts from April, 2018