*|| श्री नाकोड़ाजी ||*

*सोचो,समझो और जागो*
         

*🍁धर्म से सुख और अधर्म से दुःख*यह शास्त्रीय वचन है तो फिर *वर्तमान मे कई धर्मी व्यक्ति भी दुखी क्यों दिखाई देते है?* .................

🔹 *सुख-दुःख दोनों मे जीव स्वयंभू है।*

*🔹धर्म का प्रत्यक्ष फल सुख नहीं हैं, बल्कि धर्म करने से पुण्य का बंध होता है और उस पुण्य के उदय से सुख की प्राप्ति  होती है।उसी प्रकार अधर्म से तत्काल दुःख की प्राप्ति  न होकरअधर्म  से पाप का बंध होता हैं और उस पाप कर्म के उदय से दुःख की प्राप्ति  होती है।*
*🔹कर्म बंध के साथ ही उसकी स्थिति का भी बंध होता है वह कर्म अबाधा काल पुर्ण होने बाद ही उदय में आता हैं ।और अंतत  जैसा हमारे कर्मों का बंध होता है वैसा ही फल हमे मिलता है।*
🔹 *जीव को अपने कर्म का रस चखना ही पडता है।*

*🔹संसार में रहकर सब धन या जन से समान नहीं रह सकते है,*क्योंकि सबके कार्य पृथक-पृथक है सबकी भावना भिन्न-भिन्न तदनुरूप उनके कर्म का बंध होता है और उसका फल उनको अवश्य भोगना पडता है।*
इसको हम इस उदाहरण से भी समझ सकते है कि-*

🔹एक ही माता के चार पुत्र होते है लेकिन उन सबका भाग्य समान नहीं होता ये हमने गीत-कथा के माध्यम से भी कही बार सुना है।ये उनके किए कर्मों का ही फल होता है कि एक ही माता के पुत्र होते हुए भी अलग-अलग गति पाते है।

*यही कर्म सिद्धांत है।*

*🔹वर्तमान में कई धर्मी व्यक्ति भी दुःखी दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके पूर्व समय के स्वकृत कर्मों का भुगतान होना अब उदय में आया है और जैसे सभी को कर्मफल भुगतना होता है जो अब इस समय हो रहा होता है।*

*🔹और अभी जो धर्म कर रहा है पुण्य का बंध कर रहा है उनका अच्छा फल भी समय आने पर उदय मे आना ही आना है।*

*अंतत:यही कहना चाहूँगी कि -*

*रे जीव! सुख दुःख की तो है साझेदारी कर्म जैसे करते फल भी वैसे ही मिलते जाए*

 *संगी कर ऐसे सत्कर्म की तेरा भव भम्रणा से नाता टूट जाए*

*और कर्म रूपी पुदग्लों से पीछा छूट जाए*

*और आत्मा पद्मकमल पर विराजित हो मुक्ति पुरी को वर जाए*

*जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा  हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏🙏*
   *संगीता बागरेचा(संगी)*

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