हमारा धर्म करूणा प्रधान..
*|| श्री नाकोड़ाजी ||*
*🙏हमारा धर्म🙏*
*🙏करूणा प्रधान🙏*
*✍.........................संगी*
♻ *धर्म का मूल ही – दया या करुणाहै*
♻ *हमारे ही नहीं सभी धर्मों का मूल ही करूणा है।*
♻दया भाव से ही मनुष्य का मन द्रवित होता है।किसी दुखी को देखकर उसका दुख दूर करने की कोशिश करना ही धर्म हैं । वास्तव में करुणा ईश्वरीय गुण हैं ।
♻करुणा से महानता की और – संसार में जितने भी महान इन्सान हुए हैं, सबके जीवन में करूणा का अंग अवश्य रहा है ।
♻करूणा निस्वार्थ होती है – करुणा सात्विक भाव है । करूणा न तो अपने-पराए का भेदभाव देखती है, और न ही अपनी हानि की परवाह करती है । करूणा में अदभुत प्रेरणा होती है ।दयावान किसी को कष्ट में देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकता ।उनकी आत्मा उसे मज़बूर करती है कि दयावान दया करने से पहले अपना हानि-लाभ निश्चित करे । यहाँ तक कि वह किसी के प्राण बचाकर भी उसके बदले उससे कुछ नहीं चाहता । करूणा निस्वार्थ ही होती है ।
♻ *भगवान महावीर कहते हैं-'दया धम्मस्य जणणी'।*
अर्थात दया या करूणा धर्म की जननी है ऐसा श्री वीर प्रभुजी का कहना हे।
♻वीर प्रभु ही क्यू हमारे धर्म का मूल ही करूणा है ।
♻ *जीयो और जीने दो के सिद्धांत पर आधारित हमारा धर्म*हर वक्त हमे जीवों के प्रति करूणा का संदेश देता है।*
♻पर्युषण के पांच कर्तव्यों में प्रथम अमारिप्रवर्तन(दया या करूणा) सभी धर्मों के मूल रूप है, सभी धर्मों को हरे-भरे रखने वाली करुणारूप नदी समान है, सभी जीवों को दिया जा सकें ऐसा उत्कृष्ट दान है
♻इतिहास उठा कर देखे तो पता चलता है कितने ऐसे उदा.है जिन्होंने अपनी चिंता ना करते हुए। करूणा के चलते दयाभाव से अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया ।
♻हम नेमिनाथ प्रभुजी को कैसे भूल सकते है जिन्होने सिर्फ़ मूक प्राणियों की करूणामयी चित्कार सुन राजुल रानी के साथ अपनी 8-8भवों की प्रित भुला कर विवाह मंडप से रथ फेर संयम पथ को वर लिया तो
कुमारपाल राजा के राज्य में *‘‘मार’’* शब्द बोला भी नही जाता था।
♻एक सेठानी ने जूँ को मारा तो उसे जिनालय बंधवाने का दंड दिया।दंड भी कैसा ?खुद के भंडार भरने का नहीं, परंतु परमात्मा के जिनालय बनाने का । दंड भरने वाले का भी हित हो जाए और जिनालय के दर्शन करने वाले का भी हित हो जाए।
बहनोई अर्णोराजाने ‘‘मुंडिया को मार’’ इतना मजाक में बोला था, तो क्षमा मँगवाने के लिए युद्ध किया|।
♻18 देश के अधिपति सम्राट कुमारपाल महाराजा हर साल चातुर्मास के चार महिने हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे| मात्र पर्युषण के नौ दिन ही नहीं, चातुर्मास भर में सभी 120-दिन हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे।
कितना सत्व? हृदय कितना कोमलता और करूणा से भरा?
♻महाराजा कुमारपाल की जीवदया और जीवो के प्रति करुणा ऐसी थी कि – अपने लश्करके 11लाख घोड़े को भी पानी छानकर पिलाते थे।क्योंकि नहीं छाने हुए पानी में लाखो की संख्या में त्रस जीवों की हिंसा होती है। इन जीवों की उनके दिल में दया थी|।
महाराजा सवारी पर निकलते तब घोड़े की पलान पर बैठने से पहले पूंजणी से पलान को पूंजते थे। जिससे वहाँ कोई जीव जंतु मरे नहीं ।
♻ कुमारपाल राजा ने पौषध में मकोड़ा शरीर पर चिपकने पर मकोड़े को बचाने हेतु उतनी चमड़ी काट के अलग कर दी| आपको मच्छर काटे तो आप क्या करेगे?
सोचिए कितनी करूणा जीवों के प्रति
♻दुसरा उदा.मेघरथ राजा का जिसने कबूतर की जान बचाने हेतु अपने शरीर का मांस बाज को दे दिया ।
♻पार्श्व प्रभुजी की ये करूणा ही थी कि जलते हुए नाग नागिन को कास्ट में से बचाया ।
*♻ यही नहीं हमारे वीर प्रभुजी के बारे मे क्या कहूँ वह तो करूणानिदान कितने कितने उपसर्ग आए चण्डकौशिक ने डसा फिर भी उनकी दया करूणा मे कोई कमी नही आयी ।*
*हमेशा सत्य, अहिंसा ,क्षमा और करूणा का ही संदेश दिया।*
और
♻ *भ.महावीर का सम्पूर्ण जीवन इस तरह से संचालित था ,कि पग-पग पर करुणा का बोध होता है। तपस्या से, मोह को बांधा जा सकता है। क्रोध और तृष्णा को जीता जा सकता है*
*♻अतः भगवान महावीर की वाणी पुनः सत्य सिद्ध होती है कि दया या करुणा धर्म का मूल स्वरूप है ।*
*यह धर्म की माता है, मरना कौन चाहता है, सब जीना चाहते हैं । अतः समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का विकास ही धर्म है ।*
♻ *भगवान महावीर में विराट करुणा का साकार दर्शन होता है ।*विराट स्वरूप केवल महावीर में ही नहीं, हर जीवित जीव में है,*
♻ आज के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए तो हमारे कई साधर्मिक भाई बहन जीव दया अभियानों से जुड़ेे है।
कोई अबोल जीवो को बचाने मे लगे है तो कई साधर्मिक बंधुओं की मदद में
*ये सब हमारे करूणा प्रधान धर्म की ही देन है। जो हमारे संस्कारों मे शक्कर की तरह घुल चुके है ।*
♻ *जीओ और जीने दो* कि भावना के विकास का कारण करुणा ही है । दान, सेवा, आश्वासन, मदद, रहम, सांत्वना, संतोष आदि करुणा के ही रूप हैं ।
*♻ आज हम जैनी कि जो ‘‘सब्जी काटा’’ इत्यादि के बदले ‘‘सब्जी को सुधारा-समारा’’ ऐसा बोलकर हिंसक शब्द प्रयोग नहीं करनेवाले आज ‘‘फोन करुँगा’’ इत्यादि के बदले ‘‘मोबाइल मारुँगा’’, ‘‘रींग मारुँगा’’ ऐसे शब्दप्रयोग करने लगे हैं। यह उचित नहीं। हमें तो ‘‘एक कंकर से दो पंछी को मारा’’ ऐसा भी नहीं बोलना चाहिए। किन्तु ‘‘एक पंथ और दो काज’’ ऐसा शब्द प्रयोग करना चाहिए।*
*♻ अपनी वाणी में भी हिंसा को बढ़ावा मिले या हिंसा की अनुमोदना हो ऐसे शब्द प्रयोग नहीं होने चाहिए| क्योंकि घोर हिंसा में डूबे हुए इस जगत को अब करूणा का पाठ मात्र जैनों के पास से ही मिले ऐसे संयोग खडे हुए हैं। इस तरह आज करूणा औरअहिंसा की मोनोपोली मात्र जैनो के पास ही है, इसलिए ही जैनी के रूप में आपकी जवाबदारी ज्यादा है।*
*♻ यदि आज का विषय जो बारूद के ढेर पर बैठा है वह महावीर की करूणा को जान ले तो निश्चित रूप से शांति हो जाएगी ।*
♻ *मनुष्य मात्र में करुणा का स्पन्दन आवश्यक है ।*
♻ *हृदय की हर धड़कन में करुणा, क्षमा, अनुकम्पा, अहिंसा, दया, मैत्री आदि का समावेश होता है ।*
♻ *आवश्यकता इस बात की है कि ह्रदय में उपजती करुणा, कृपा को होंठों तथा मस्तिष्क तक लाया जाए और आवश्यकता होने पर इसे व्यावहारिक बनाया जाए ।*
♻ *यदि करुणा को आधार मानकर सोचा जाए तो सम्पूर्ण विश्व में शांति, आदर, समरसता स्थापित हो सकती है ।*
*हमारे सामाजिक सरोकारों का प्रमुख आधार ही करुणा या दया होनी चाहिए ।*
जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏🙏
🙏🌹 *जीयो और जीने दो*🌹🙏
*🙏संगीता बागरेचा (संगी)🙏*
*🙏हमारा धर्म🙏*
*🙏करूणा प्रधान🙏*
*✍.........................संगी*
♻ *धर्म का मूल ही – दया या करुणाहै*
♻ *हमारे ही नहीं सभी धर्मों का मूल ही करूणा है।*
♻दया भाव से ही मनुष्य का मन द्रवित होता है।किसी दुखी को देखकर उसका दुख दूर करने की कोशिश करना ही धर्म हैं । वास्तव में करुणा ईश्वरीय गुण हैं ।
♻करुणा से महानता की और – संसार में जितने भी महान इन्सान हुए हैं, सबके जीवन में करूणा का अंग अवश्य रहा है ।
♻करूणा निस्वार्थ होती है – करुणा सात्विक भाव है । करूणा न तो अपने-पराए का भेदभाव देखती है, और न ही अपनी हानि की परवाह करती है । करूणा में अदभुत प्रेरणा होती है ।दयावान किसी को कष्ट में देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकता ।उनकी आत्मा उसे मज़बूर करती है कि दयावान दया करने से पहले अपना हानि-लाभ निश्चित करे । यहाँ तक कि वह किसी के प्राण बचाकर भी उसके बदले उससे कुछ नहीं चाहता । करूणा निस्वार्थ ही होती है ।
♻ *भगवान महावीर कहते हैं-'दया धम्मस्य जणणी'।*
अर्थात दया या करूणा धर्म की जननी है ऐसा श्री वीर प्रभुजी का कहना हे।
♻वीर प्रभु ही क्यू हमारे धर्म का मूल ही करूणा है ।
♻ *जीयो और जीने दो के सिद्धांत पर आधारित हमारा धर्म*हर वक्त हमे जीवों के प्रति करूणा का संदेश देता है।*
♻पर्युषण के पांच कर्तव्यों में प्रथम अमारिप्रवर्तन(दया या करूणा) सभी धर्मों के मूल रूप है, सभी धर्मों को हरे-भरे रखने वाली करुणारूप नदी समान है, सभी जीवों को दिया जा सकें ऐसा उत्कृष्ट दान है
♻इतिहास उठा कर देखे तो पता चलता है कितने ऐसे उदा.है जिन्होंने अपनी चिंता ना करते हुए। करूणा के चलते दयाभाव से अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया ।
♻हम नेमिनाथ प्रभुजी को कैसे भूल सकते है जिन्होने सिर्फ़ मूक प्राणियों की करूणामयी चित्कार सुन राजुल रानी के साथ अपनी 8-8भवों की प्रित भुला कर विवाह मंडप से रथ फेर संयम पथ को वर लिया तो
कुमारपाल राजा के राज्य में *‘‘मार’’* शब्द बोला भी नही जाता था।
♻एक सेठानी ने जूँ को मारा तो उसे जिनालय बंधवाने का दंड दिया।दंड भी कैसा ?खुद के भंडार भरने का नहीं, परंतु परमात्मा के जिनालय बनाने का । दंड भरने वाले का भी हित हो जाए और जिनालय के दर्शन करने वाले का भी हित हो जाए।
बहनोई अर्णोराजाने ‘‘मुंडिया को मार’’ इतना मजाक में बोला था, तो क्षमा मँगवाने के लिए युद्ध किया|।
♻18 देश के अधिपति सम्राट कुमारपाल महाराजा हर साल चातुर्मास के चार महिने हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे| मात्र पर्युषण के नौ दिन ही नहीं, चातुर्मास भर में सभी 120-दिन हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे।
कितना सत्व? हृदय कितना कोमलता और करूणा से भरा?
♻महाराजा कुमारपाल की जीवदया और जीवो के प्रति करुणा ऐसी थी कि – अपने लश्करके 11लाख घोड़े को भी पानी छानकर पिलाते थे।क्योंकि नहीं छाने हुए पानी में लाखो की संख्या में त्रस जीवों की हिंसा होती है। इन जीवों की उनके दिल में दया थी|।
महाराजा सवारी पर निकलते तब घोड़े की पलान पर बैठने से पहले पूंजणी से पलान को पूंजते थे। जिससे वहाँ कोई जीव जंतु मरे नहीं ।
♻ कुमारपाल राजा ने पौषध में मकोड़ा शरीर पर चिपकने पर मकोड़े को बचाने हेतु उतनी चमड़ी काट के अलग कर दी| आपको मच्छर काटे तो आप क्या करेगे?
सोचिए कितनी करूणा जीवों के प्रति
♻दुसरा उदा.मेघरथ राजा का जिसने कबूतर की जान बचाने हेतु अपने शरीर का मांस बाज को दे दिया ।
♻पार्श्व प्रभुजी की ये करूणा ही थी कि जलते हुए नाग नागिन को कास्ट में से बचाया ।
*♻ यही नहीं हमारे वीर प्रभुजी के बारे मे क्या कहूँ वह तो करूणानिदान कितने कितने उपसर्ग आए चण्डकौशिक ने डसा फिर भी उनकी दया करूणा मे कोई कमी नही आयी ।*
*हमेशा सत्य, अहिंसा ,क्षमा और करूणा का ही संदेश दिया।*
और
♻ *भ.महावीर का सम्पूर्ण जीवन इस तरह से संचालित था ,कि पग-पग पर करुणा का बोध होता है। तपस्या से, मोह को बांधा जा सकता है। क्रोध और तृष्णा को जीता जा सकता है*
*♻अतः भगवान महावीर की वाणी पुनः सत्य सिद्ध होती है कि दया या करुणा धर्म का मूल स्वरूप है ।*
*यह धर्म की माता है, मरना कौन चाहता है, सब जीना चाहते हैं । अतः समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का विकास ही धर्म है ।*
♻ *भगवान महावीर में विराट करुणा का साकार दर्शन होता है ।*विराट स्वरूप केवल महावीर में ही नहीं, हर जीवित जीव में है,*
♻ आज के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए तो हमारे कई साधर्मिक भाई बहन जीव दया अभियानों से जुड़ेे है।
कोई अबोल जीवो को बचाने मे लगे है तो कई साधर्मिक बंधुओं की मदद में
*ये सब हमारे करूणा प्रधान धर्म की ही देन है। जो हमारे संस्कारों मे शक्कर की तरह घुल चुके है ।*
♻ *जीओ और जीने दो* कि भावना के विकास का कारण करुणा ही है । दान, सेवा, आश्वासन, मदद, रहम, सांत्वना, संतोष आदि करुणा के ही रूप हैं ।
*♻ आज हम जैनी कि जो ‘‘सब्जी काटा’’ इत्यादि के बदले ‘‘सब्जी को सुधारा-समारा’’ ऐसा बोलकर हिंसक शब्द प्रयोग नहीं करनेवाले आज ‘‘फोन करुँगा’’ इत्यादि के बदले ‘‘मोबाइल मारुँगा’’, ‘‘रींग मारुँगा’’ ऐसे शब्दप्रयोग करने लगे हैं। यह उचित नहीं। हमें तो ‘‘एक कंकर से दो पंछी को मारा’’ ऐसा भी नहीं बोलना चाहिए। किन्तु ‘‘एक पंथ और दो काज’’ ऐसा शब्द प्रयोग करना चाहिए।*
*♻ अपनी वाणी में भी हिंसा को बढ़ावा मिले या हिंसा की अनुमोदना हो ऐसे शब्द प्रयोग नहीं होने चाहिए| क्योंकि घोर हिंसा में डूबे हुए इस जगत को अब करूणा का पाठ मात्र जैनों के पास से ही मिले ऐसे संयोग खडे हुए हैं। इस तरह आज करूणा औरअहिंसा की मोनोपोली मात्र जैनो के पास ही है, इसलिए ही जैनी के रूप में आपकी जवाबदारी ज्यादा है।*
*♻ यदि आज का विषय जो बारूद के ढेर पर बैठा है वह महावीर की करूणा को जान ले तो निश्चित रूप से शांति हो जाएगी ।*
♻ *मनुष्य मात्र में करुणा का स्पन्दन आवश्यक है ।*
♻ *हृदय की हर धड़कन में करुणा, क्षमा, अनुकम्पा, अहिंसा, दया, मैत्री आदि का समावेश होता है ।*
♻ *आवश्यकता इस बात की है कि ह्रदय में उपजती करुणा, कृपा को होंठों तथा मस्तिष्क तक लाया जाए और आवश्यकता होने पर इसे व्यावहारिक बनाया जाए ।*
♻ *यदि करुणा को आधार मानकर सोचा जाए तो सम्पूर्ण विश्व में शांति, आदर, समरसता स्थापित हो सकती है ।*
*हमारे सामाजिक सरोकारों का प्रमुख आधार ही करुणा या दया होनी चाहिए ।*
जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏🙏
🙏🌹 *जीयो और जीने दो*🌹🙏
*🙏संगीता बागरेचा (संगी)🙏*


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