मौन एकादशी का महत्व आज के परिपेक्ष्य में.....😢
*||श्री नाकोडाजी||*
*आत्ममंथन*
*जीवन की नई सोच.....*
*जीवन की नई दिशा.....*
*✍ संगी की कलम से....*
*मौन एकादशी महत्व आज के परिप्रेक्ष्य में.................*
🌀 इस पृथ्वीतल पर 12 महिनों में सर्वश्रेष्ठ दिन हैं। मगसर सुदी एकादशी का,जिसे हम मौन एकादशी के नाम से भी जानते हैं
इस दिन तीर्थंकर परमात्मा के कुल 150 कल्याणक हुए हैं।और जो आत्मा विधिपूर्वक मगसर सुदी एकादशी की 11वर्ष तक आराधना करती हैं वह (आत्मा) अल्पकाल में मोक्षसुख प्राप्त करती हैं ।
🌀 आज के पवित्र दिन याने मार्गशीष महिने की एकादशी को 18 वें तीर्थकर परमात्मा अरनाथ भगवान ने राजपाट त्यागकर दीक्षा ग्रहण की थी। वहीं उन्नीसवें तीर्थकर मल्लीनाथ भगवान का जन्म, दीक्षा तथा केवलज्ञान यह तीनों कल्याणक इसी एकादशी के दिन हुए और 21वें तीर्थकर नमिनाथ प्रभू का केवलज्ञान कल्याणक भी इसी दिन सम्पन्न हुआ। इस प्रकार तीन तीर्थकर के पांच कल्याणक मार्गशीष शुक्ल एकादशी के कल्याणकारी दिन को पूर्ण हुए। इस प्रकार इस भरत क्षेत्र के अतीत काल अर्थात कत उत्सर्पिणी के चौथे महाजश,छठे सर्वानुभूति और सातवें सीमंधर प्रभु के भी कुल पाँच कल्याणक का दिन है
🌀 इस प्रकार आगामी चौबिसी में होने वाले चौथे स्वयंप्रभु,छठे देवसूत्र और सातमें उदयनाथ तीर्थंकर परमात्मा के पाँच कल्याणक भी आज के दिन होंगे
इस प्रकार भरत क्षेत्र के 45 तीर्थकरों के कुल 75 कल्याणक हुए हैं ।
🌀 पाँच भरत क्षेत्र की तरह पाँच ऐरावत क्षेत्र मे भी भूत,भविष्य और वर्तमान चौबिसी के 45 तीर्थकरों के कुल 75 कल्याणक हुए है
इस प्रकार पाँच भरत के 75 कल्याणक तथा पाँच ऐरावत क्षेत्र के 75 कल्याणक होने से 150 कल्याणक हुए।
🌀 तीर्थकर परमात्मा अनंत पुण्यों के पुंज होते है। उनके पुण्यों के उनके कल्याणकों से चारो गतियों में विचरित प्राणी मात्र को शांति, सुख और हर्ष की अनुभूति होती है। इस दिन तप-जप और मौन द्वारा तीनों तीर्थकर की आराधना की जाती है।
मौन में साधना हैं।
मौन में संयम हैं
मौन में संगीत हैं
मौन में लय है
मौन में ताल हैं
मौन में क्रोध पर अंकुश हैं
मौन में आत्मकल्याण हैं
मौन में विनय हैं
मौन में विवेकता हैं
मौन में अव्याबाध सुख हैं
🌀 कहते है जो व्यक्ति सचमुच धर्म के प्रति वफादार रहता है धर्म उसकी रक्षा अवश्य करता हैं ।
एक व्यक्ति की धर्मनिष्ठा अनेक व्यक्तियों को धर्माभिमुख बनाती हैं ।
पौराणिक कथानुसार सुव्रत श्रेष्ठी को भी अपना धर्म फला
प्रतिकूल उपसर्ग को भी
समतापूर्वक सहन कर प्रतिकूल संयोगो में भी लेशमात्र भी चलायमान नही हुए और अत्यंत
ही समता भाव से मौन रहकर सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो गए ।
🌀 इस प्रकार मौन रहकर मौन एकादशी की निर्मल आराधना के फलस्वरूप सुव्रत मुनि ने आत्मा का कल्याण किया ।
मौन मन का आंतरीक तप है, वही वचन का तप है।मौनयुक्त उपवास करने से मन-वचन और तप तीनों योगों द्वारा आराधना होने से इंद्रिय संयम,वाणी संयम और एकाग्रता ध्यान संयम तीनों का संयम याने मौन एकादशी।
🌀 मौन की वास्तविक व्याख्या करते हुए श्रीमदयशोविजयजी म.सा.ने कहा हैं -
*सुलभं वागनुच्चारं, मौनमेकेन्द्रियेष्वपि।*
*पुद्गलेष्वप्रवृतिस्तु, योगानां मौनमुत्तमम्।।*
🙏अर्थात वाणी से नहीं बोलने रूप मौन तो एकेन्द्रिय जीवों में भी सुलभ हैं,परंतु पुदग्लों में मन, वचन और काया की प्रवृत्ति नहीं होना यही श्रेष्ठ मौन हैं ।
पशु अधिकांशतः मौन रहते हैं । मौन साधना का अर्थ यदि वाणी से नही बोलना इतना ही होता तो इन पशु-पक्षियों के जीवन में निरन्तर मौन की साधना का स्वीकार किया जाता परंतु मौन का वास्तविक अर्थ यह नहीं हैं ।
🌀 मौन का वास्तविक अर्थ है पौदगलिक भाव में अप्रवृत्ति।इस दृष्टि से मौन के तीन भेद है।
*1•मन का मौन-* आत्मा से भिन्न अनात्मभाव पोषकपौदगलिक पदार्थों का चिंतन नहीं करना।
हिंसा,झूठ,चोरी,अनाचार आदि पापविचारों का सर्वथा त्याग करना,यह मन का मौन है
प्रिय पदार्थों के संयोग का चिंतन करना,अप्रिय पदार्थ के वियोग का चिंतन करना इत्यादि संकल्प -विकल्पों का त्याग करना ही मन का वास्तविक मौन हैं ।
*2•वचन का मौन-* वाणी द्वारा झूठे वचन नहीं बोलना,अप्रिय, अहितकर और कठोर वचन नही बोलना,किसी के ऊपर झूठा आरोप नहीं लगाना ,किसी की निंदा नही करना, पुदग्ल के अनुकूल रूप-रस-गंध-स्पर्श आदि की प्रशंसा नहीं करना इत्यादि वचन का मौन है ।
*3• काया का मौन-* काया द्वारा पुदग्ल-भाव पोषक प्रवृत्ति का त्याग करना, यह काया का मौन हैं ।
यह मौन का निषेधात्मक स्वरूप हुआ।
मौन का विधेयात्मक स्वरूप भी हैं ।
🙏मन को धर्म ध्यान में जोड़ना,मन द्वारा शुभ विचार करना, मन में क्षमा भाव, नम्रता भाव आदि धारण करना मन का मौन हैं
🙏वचन से सत्य,प्रिय और हितकारी वचन बोलना यह भी वचन का मौन हैं ।
🙏काया द्वारा आत्म-हितकर प्रवृत्ति करना यह भी तन का मौन हैं
🌀अंततः मन,वचन और काया की जिन जिन प्रवृत्तियों द्वारा आत्मा, पौदगलिक भावों से मुक्त बनकर आत्म-भाव में लीन बनती हैं, उन सब क्रियाओं में मौन व्रत की ही साधना रही हुई है।
🌀अब विचारणीय है कि हम मौन एकादशी पर कौनसी साधना विशेष करते हैं। और कैसे करते है? ये पंचमकाल कलयुग हैं ।
*हम मौन रहकर साधना करते हैं*
*या मौन रहकर मतलब साधते हैं*
ये *आत्ममंथन* आप अपने स्वयं पर जरूर से करें और उसके बाद ही सही मायने मे जो मौन का अर्थ है उसे असल मे चरितार्थ करें।
तो मौन एकादशी की साधना जरूर से फलेगी।
🙏जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏
🌀 *आपकी टिप्पणी अपेक्षित है......*
📜📜📜📜📜📜📜📜📜 *सम्पादिका*
✒ *संगीता बागरेचा【संगी】*
भायंदर- मुम्बई / सादड़ी (राज.)
*✍🏼 आपसे नम्र निवेदन है ज्ञान की पोस्ट में कोई फेरबदल ना करें।*
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*आत्ममंथन*
*जीवन की नई सोच.....*
*जीवन की नई दिशा.....*
*✍ संगी की कलम से....*
*मौन एकादशी महत्व आज के परिप्रेक्ष्य में.................*
🌀 इस पृथ्वीतल पर 12 महिनों में सर्वश्रेष्ठ दिन हैं। मगसर सुदी एकादशी का,जिसे हम मौन एकादशी के नाम से भी जानते हैं
इस दिन तीर्थंकर परमात्मा के कुल 150 कल्याणक हुए हैं।और जो आत्मा विधिपूर्वक मगसर सुदी एकादशी की 11वर्ष तक आराधना करती हैं वह (आत्मा) अल्पकाल में मोक्षसुख प्राप्त करती हैं ।
🌀 आज के पवित्र दिन याने मार्गशीष महिने की एकादशी को 18 वें तीर्थकर परमात्मा अरनाथ भगवान ने राजपाट त्यागकर दीक्षा ग्रहण की थी। वहीं उन्नीसवें तीर्थकर मल्लीनाथ भगवान का जन्म, दीक्षा तथा केवलज्ञान यह तीनों कल्याणक इसी एकादशी के दिन हुए और 21वें तीर्थकर नमिनाथ प्रभू का केवलज्ञान कल्याणक भी इसी दिन सम्पन्न हुआ। इस प्रकार तीन तीर्थकर के पांच कल्याणक मार्गशीष शुक्ल एकादशी के कल्याणकारी दिन को पूर्ण हुए। इस प्रकार इस भरत क्षेत्र के अतीत काल अर्थात कत उत्सर्पिणी के चौथे महाजश,छठे सर्वानुभूति और सातवें सीमंधर प्रभु के भी कुल पाँच कल्याणक का दिन है
🌀 इस प्रकार आगामी चौबिसी में होने वाले चौथे स्वयंप्रभु,छठे देवसूत्र और सातमें उदयनाथ तीर्थंकर परमात्मा के पाँच कल्याणक भी आज के दिन होंगे
इस प्रकार भरत क्षेत्र के 45 तीर्थकरों के कुल 75 कल्याणक हुए हैं ।
🌀 पाँच भरत क्षेत्र की तरह पाँच ऐरावत क्षेत्र मे भी भूत,भविष्य और वर्तमान चौबिसी के 45 तीर्थकरों के कुल 75 कल्याणक हुए है
इस प्रकार पाँच भरत के 75 कल्याणक तथा पाँच ऐरावत क्षेत्र के 75 कल्याणक होने से 150 कल्याणक हुए।
🌀 तीर्थकर परमात्मा अनंत पुण्यों के पुंज होते है। उनके पुण्यों के उनके कल्याणकों से चारो गतियों में विचरित प्राणी मात्र को शांति, सुख और हर्ष की अनुभूति होती है। इस दिन तप-जप और मौन द्वारा तीनों तीर्थकर की आराधना की जाती है।
मौन में साधना हैं।
मौन में संयम हैं
मौन में संगीत हैं
मौन में लय है
मौन में ताल हैं
मौन में क्रोध पर अंकुश हैं
मौन में आत्मकल्याण हैं
मौन में विनय हैं
मौन में विवेकता हैं
मौन में अव्याबाध सुख हैं
🌀 कहते है जो व्यक्ति सचमुच धर्म के प्रति वफादार रहता है धर्म उसकी रक्षा अवश्य करता हैं ।
एक व्यक्ति की धर्मनिष्ठा अनेक व्यक्तियों को धर्माभिमुख बनाती हैं ।
पौराणिक कथानुसार सुव्रत श्रेष्ठी को भी अपना धर्म फला
प्रतिकूल उपसर्ग को भी
समतापूर्वक सहन कर प्रतिकूल संयोगो में भी लेशमात्र भी चलायमान नही हुए और अत्यंत
ही समता भाव से मौन रहकर सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो गए ।
🌀 इस प्रकार मौन रहकर मौन एकादशी की निर्मल आराधना के फलस्वरूप सुव्रत मुनि ने आत्मा का कल्याण किया ।
मौन मन का आंतरीक तप है, वही वचन का तप है।मौनयुक्त उपवास करने से मन-वचन और तप तीनों योगों द्वारा आराधना होने से इंद्रिय संयम,वाणी संयम और एकाग्रता ध्यान संयम तीनों का संयम याने मौन एकादशी।
🌀 मौन की वास्तविक व्याख्या करते हुए श्रीमदयशोविजयजी म.सा.ने कहा हैं -
*सुलभं वागनुच्चारं, मौनमेकेन्द्रियेष्वपि।*
*पुद्गलेष्वप्रवृतिस्तु, योगानां मौनमुत्तमम्।।*
🙏अर्थात वाणी से नहीं बोलने रूप मौन तो एकेन्द्रिय जीवों में भी सुलभ हैं,परंतु पुदग्लों में मन, वचन और काया की प्रवृत्ति नहीं होना यही श्रेष्ठ मौन हैं ।
पशु अधिकांशतः मौन रहते हैं । मौन साधना का अर्थ यदि वाणी से नही बोलना इतना ही होता तो इन पशु-पक्षियों के जीवन में निरन्तर मौन की साधना का स्वीकार किया जाता परंतु मौन का वास्तविक अर्थ यह नहीं हैं ।
🌀 मौन का वास्तविक अर्थ है पौदगलिक भाव में अप्रवृत्ति।इस दृष्टि से मौन के तीन भेद है।
*1•मन का मौन-* आत्मा से भिन्न अनात्मभाव पोषकपौदगलिक पदार्थों का चिंतन नहीं करना।
हिंसा,झूठ,चोरी,अनाचार आदि पापविचारों का सर्वथा त्याग करना,यह मन का मौन है
प्रिय पदार्थों के संयोग का चिंतन करना,अप्रिय पदार्थ के वियोग का चिंतन करना इत्यादि संकल्प -विकल्पों का त्याग करना ही मन का वास्तविक मौन हैं ।
*2•वचन का मौन-* वाणी द्वारा झूठे वचन नहीं बोलना,अप्रिय, अहितकर और कठोर वचन नही बोलना,किसी के ऊपर झूठा आरोप नहीं लगाना ,किसी की निंदा नही करना, पुदग्ल के अनुकूल रूप-रस-गंध-स्पर्श आदि की प्रशंसा नहीं करना इत्यादि वचन का मौन है ।
*3• काया का मौन-* काया द्वारा पुदग्ल-भाव पोषक प्रवृत्ति का त्याग करना, यह काया का मौन हैं ।
यह मौन का निषेधात्मक स्वरूप हुआ।
मौन का विधेयात्मक स्वरूप भी हैं ।
🙏मन को धर्म ध्यान में जोड़ना,मन द्वारा शुभ विचार करना, मन में क्षमा भाव, नम्रता भाव आदि धारण करना मन का मौन हैं
🙏वचन से सत्य,प्रिय और हितकारी वचन बोलना यह भी वचन का मौन हैं ।
🙏काया द्वारा आत्म-हितकर प्रवृत्ति करना यह भी तन का मौन हैं
🌀अंततः मन,वचन और काया की जिन जिन प्रवृत्तियों द्वारा आत्मा, पौदगलिक भावों से मुक्त बनकर आत्म-भाव में लीन बनती हैं, उन सब क्रियाओं में मौन व्रत की ही साधना रही हुई है।
🌀अब विचारणीय है कि हम मौन एकादशी पर कौनसी साधना विशेष करते हैं। और कैसे करते है? ये पंचमकाल कलयुग हैं ।
*हम मौन रहकर साधना करते हैं*
*या मौन रहकर मतलब साधते हैं*
ये *आत्ममंथन* आप अपने स्वयं पर जरूर से करें और उसके बाद ही सही मायने मे जो मौन का अर्थ है उसे असल मे चरितार्थ करें।
तो मौन एकादशी की साधना जरूर से फलेगी।
🙏जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏
🌀 *आपकी टिप्पणी अपेक्षित है......*
📜📜📜📜📜📜📜📜📜 *सम्पादिका*
✒ *संगीता बागरेचा【संगी】*
भायंदर- मुम्बई / सादड़ी (राज.)
*✍🏼 आपसे नम्र निवेदन है ज्ञान की पोस्ट में कोई फेरबदल ना करें।*
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