*||श्री नाकोडाजी||*
*आत्ममंथन*
*जीवन की नई सोच.....*
*जीवन की नई दिशा.....*
*✍ संगी की कलम से....*
*क्या हमारे मन मे रहे भाव(क्रोध राग द्वेष)हमारी दुर्गति का कारण बन सकते है*⁉⁉
*भाव से भव*
*भाव से भवभम्रणा*
*भाव से गति*
*भाव से भक्ति*
*भाव से ही मुक्ति*
हाँ , हमारे मन मे रहे भाव (क्रोध रागव्दैष मान माया मोह )हमारी दुर्गति का कारण बन सकते है
🌀बल्कि हम यू कह सकते है कि ये ही कारण है जिससे व्दारा जीव की गति तय होती है
🌀या यू कहे कि मन के भावो से ही सदगति या दुर्गति निश्चित होतीहै ।
🌀जैसे हमारे मन के भाव वैसे ही हमारे कर्म और वैसी ही गति
🌀शुभ औरअशुभ भाव है । मन मे दोनो भाव आ सकते है ।
🌀यदि इस प्रकार के अशुभ भाव आये और आप ने बरोबर समय पे उसको रोका नही तो यह दुर्भाव आपको दुर्गति मे ले जा सकते है ।
🌀मन के भाव मतलब मनोयोग । इसके लिए उत्तम उदाहरण दे सकते है ।प्रसन्नचन्द्र राजर्षि का या तान्दुल्य मत्स्य का
और भी कही उदाहरण है हमारे शास्त्रों मे
🌀किसी ने भावो के कारण मुक्ति पायी तो किसी ने नरक(प्रसन्न चन्द्रजी मोक्ष मे तो तान्दुल्यमत्स्य नारकी मै)
🌀जरा सा भी किया गया क्रोध या राग हमारे अनंतानुबंधी कर्मों को बाँध सकता है और हमे अनंतकाल तक की भव भम्रणा मे भटकना पड सकता है
🌀वही भाव से किया गया किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया ,करूणा क्षमता हमे मुक्ति के व्दार पर ले जा सकते है।
🌀हम सभी हर क्षण जाने अनजाने भावो के व्दारा अनंतानुबंधी पापकर्मो का बंध करते हे तो कभी कर्मनिर्जरा
🌀तो सोचिए इस संसार मे हम हर वक्त अपने कर्मों की निर्जरा कर सकते है ।अनंतानुबंधी पुण्य बल से हमे जो ये मनुष्य जन्म मिला है इसे ऐसे व्यर्थ ही जाने देना है या
*हर पल हर क्षण हमे अपने लिए नरको के व्दार खोलना है । या मुक्ति रमणी को वरना है।*
खुद के दोषों को भाव से शुद्धि पूर्वक प्रकाशित करने का नाम आलोचना
स्वयं के दोषों को आत्मसाक्षी से स्वमुख से पश्चाताप करने का नाम आत्मनिंदा(चंदनाजी इसका अच्छा उदा.)
आतम साक्षी से पश्चाताप करने के बाद गुरू साक्षी से पश्चाताप करने का नाम आत्मग्रहा (मृगावती जी)
✍🏼
अंतत; इतना ही कहूँगी कि-
हे। जीव
*कृतजुग प्रेता व्दापर*
*पूजा मख अरू जोग*
*जो गति होई सो कलि*
*प्रभु (चेक) नाम ते पापहिं लोग।*
या
*त्वत्त्संस्तवेन भव संतति सन्निबद्धं,*
*पापंक्षणात् क्षयमुपैति शरीरभाजम्*
अर्थात सतयुग त्रेता और व्दापर में जो गति पूजा यज्ञ और योग से प्राप्त होती थी ।वह मे कलियुग मे भावपूर्वक भगवान भक्ति से पा सकते है या प्रभु की भाव से भक्ति भजन करने मात्र से अनेक भवो के पाप कर्मो का क्षय हो सकता है।
*जब हम शुद्ध निर्मल भाव से भक्ति मे लीन हो जाए उस क्षण किसी के प्रति न राग रहता है ना व्दैष सिर्फ परम परमात्मा की और लीनता रहती है।।*
*उस समय भाव निर्मल होते है और भाव की निर्मलता व पाप का प्रायश्चित ही मोक्ष प्राप्ति की सिढी है*
*भावे भावना भाविए भावे दिजे दान।*
*भावे जिनवर पूजिए ,भावे केवलज्ञान।*
उपरोक्त स्तुति में आज के इस विषय का पूरा सार छुपा है।
*मन के हारे हार है*
और
*मन के जिते जित*
*हे। जीव* कभी भूल से भी अशुद्ध
भाव जो मन पर आए*
तो उनको दूर करने का प्रयत्न कर
*कर प्रभु सू प्रित यही साची रीत*
*निर्मल भाव सू तोड कर्म की भीत*
*संगी करले वरले*
*आत्ममंथन से मुक्ति पुरी को जीत*
जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏🙏
🌀 *आपकी टिप्पणी अपेक्षित है......*
📜📜📜📜📜📜📜📜📜 *सम्पादिका*
✒ *संगीता बागरेचा【संगी】*
भायंदर- मुम्बई / सादड़ी (राज.)
*✍🏼 आपसे नम्र निवेदन है ज्ञान की पोस्ट में कोई फेरबदल ना करें।*
💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀💱🌀
*आत्ममंथन*
*जीवन की नई सोच.....*
*जीवन की नई दिशा.....*
*✍ संगी की कलम से....*
*क्या हमारे मन मे रहे भाव(क्रोध राग द्वेष)हमारी दुर्गति का कारण बन सकते है*⁉⁉
*भाव से भव*
*भाव से भवभम्रणा*
*भाव से गति*
*भाव से भक्ति*
*भाव से ही मुक्ति*
हाँ , हमारे मन मे रहे भाव (क्रोध रागव्दैष मान माया मोह )हमारी दुर्गति का कारण बन सकते है
🌀बल्कि हम यू कह सकते है कि ये ही कारण है जिससे व्दारा जीव की गति तय होती है
🌀या यू कहे कि मन के भावो से ही सदगति या दुर्गति निश्चित होतीहै ।
🌀जैसे हमारे मन के भाव वैसे ही हमारे कर्म और वैसी ही गति
🌀शुभ औरअशुभ भाव है । मन मे दोनो भाव आ सकते है ।
🌀यदि इस प्रकार के अशुभ भाव आये और आप ने बरोबर समय पे उसको रोका नही तो यह दुर्भाव आपको दुर्गति मे ले जा सकते है ।
🌀मन के भाव मतलब मनोयोग । इसके लिए उत्तम उदाहरण दे सकते है ।प्रसन्नचन्द्र राजर्षि का या तान्दुल्य मत्स्य का
और भी कही उदाहरण है हमारे शास्त्रों मे
🌀किसी ने भावो के कारण मुक्ति पायी तो किसी ने नरक(प्रसन्न चन्द्रजी मोक्ष मे तो तान्दुल्यमत्स्य नारकी मै)
🌀जरा सा भी किया गया क्रोध या राग हमारे अनंतानुबंधी कर्मों को बाँध सकता है और हमे अनंतकाल तक की भव भम्रणा मे भटकना पड सकता है
🌀वही भाव से किया गया किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया ,करूणा क्षमता हमे मुक्ति के व्दार पर ले जा सकते है।
🌀हम सभी हर क्षण जाने अनजाने भावो के व्दारा अनंतानुबंधी पापकर्मो का बंध करते हे तो कभी कर्मनिर्जरा
🌀तो सोचिए इस संसार मे हम हर वक्त अपने कर्मों की निर्जरा कर सकते है ।अनंतानुबंधी पुण्य बल से हमे जो ये मनुष्य जन्म मिला है इसे ऐसे व्यर्थ ही जाने देना है या
*हर पल हर क्षण हमे अपने लिए नरको के व्दार खोलना है । या मुक्ति रमणी को वरना है।*
खुद के दोषों को भाव से शुद्धि पूर्वक प्रकाशित करने का नाम आलोचना
स्वयं के दोषों को आत्मसाक्षी से स्वमुख से पश्चाताप करने का नाम आत्मनिंदा(चंदनाजी इसका अच्छा उदा.)
आतम साक्षी से पश्चाताप करने के बाद गुरू साक्षी से पश्चाताप करने का नाम आत्मग्रहा (मृगावती जी)
✍🏼
अंतत; इतना ही कहूँगी कि-
हे। जीव
*कृतजुग प्रेता व्दापर*
*पूजा मख अरू जोग*
*जो गति होई सो कलि*
*प्रभु (चेक) नाम ते पापहिं लोग।*
या
*त्वत्त्संस्तवेन भव संतति सन्निबद्धं,*
*पापंक्षणात् क्षयमुपैति शरीरभाजम्*
अर्थात सतयुग त्रेता और व्दापर में जो गति पूजा यज्ञ और योग से प्राप्त होती थी ।वह मे कलियुग मे भावपूर्वक भगवान भक्ति से पा सकते है या प्रभु की भाव से भक्ति भजन करने मात्र से अनेक भवो के पाप कर्मो का क्षय हो सकता है।
*जब हम शुद्ध निर्मल भाव से भक्ति मे लीन हो जाए उस क्षण किसी के प्रति न राग रहता है ना व्दैष सिर्फ परम परमात्मा की और लीनता रहती है।।*
*उस समय भाव निर्मल होते है और भाव की निर्मलता व पाप का प्रायश्चित ही मोक्ष प्राप्ति की सिढी है*
*भावे भावना भाविए भावे दिजे दान।*
*भावे जिनवर पूजिए ,भावे केवलज्ञान।*
उपरोक्त स्तुति में आज के इस विषय का पूरा सार छुपा है।
*मन के हारे हार है*
और
*मन के जिते जित*
*हे। जीव* कभी भूल से भी अशुद्ध
भाव जो मन पर आए*
तो उनको दूर करने का प्रयत्न कर
*कर प्रभु सू प्रित यही साची रीत*
*निर्मल भाव सू तोड कर्म की भीत*
*संगी करले वरले*
*आत्ममंथन से मुक्ति पुरी को जीत*
जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम 🙏🙏
🌀 *आपकी टिप्पणी अपेक्षित है......*
📜📜📜📜📜📜📜📜📜 *सम्पादिका*
✒ *संगीता बागरेचा【संगी】*
भायंदर- मुम्बई / सादड़ी (राज.)
*✍🏼 आपसे नम्र निवेदन है ज्ञान की पोस्ट में कोई फेरबदल ना करें।*
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