बसंत पंचमी

*||श्री नाकोड़ाजी||*

*बसंत पंचमी*

*अज्ञान तिमिर का संहार हो*
*शील साहस का प्रसार हो*
*शीश चरणों में झुकें हैं माँ वाग्धरा*
*ज्ञान ध्यान ऋद्धि देय माँ*
*अधिश्वरा.........*

*ज्ञान का भंडार दो*
*लेखनी में निखार दो*
*वाणी में मिठास दो*
*संगी*तमय साथ दो*

बसंत पंचमी का दिन मां सरस्वती को समर्पित है। माता सरस्वती को बुद्धि और विद्या की देवी माना जाता है। इस महीने के दौरान मौसम काफी सुहावना हो जाता है। इस दौरान न तो ज्यादा ही गर्मी होती है और न ही ज्यादा ठंड होती है और यही वजह है कि बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है।अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया हैं इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं।पंच-तत्व जल, वायु,धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं।ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते है तो किसान जौ की बलियो और सरसों के फूलों को देखकर फुले नही समाते प्रकृति में नवचेतना जगृत होती हैं श्रवण में पनपी हरियाली शरद के बाद हेमंत और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती हैं तब बसंत उसका सौंदर्य लौटा देता है नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकरअनुपम अद्भुत बना देता हैं

 बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की खास पूजा की जाती है। इस दिन लोग अलग-अलग मूहर्त पर पूजा-पाठ करते हैं।बसंत पंचमी पर निम्न कथाएं भी प्रचलित हैं

हिंदु पौराणिक कथाओं में प्रचलित एक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने संसार की रचना की। उन्होंने पेड़-पौधे, जीव-जन्तु और मनुष्य बनाए, लेकिन उन्हें लगा कि उनकी रचना में कुछ कमी रह गई। इसीलिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उस स्त्री के एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में था। ब्रह्मा जी ने इस सुंदर देवी से वीणा बजाने को कहा। जैसे वीणा बजी ब्रह्मा जी की बनाई हर चीज़ में स्वर आ गया। तभी ब्रह्मा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया। वह दिन बसंत पंचमी का था। इसी वजह से हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्मदिन मनाया जाने लगा और उनकी पूजा की जाने लगी।

*तो दूसरी कथा अनुसार....*

सृष्टिकाल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में जानी जाती हैं।

भगवती सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा सर्वदा शास्त्र-ज्ञान देने वाली हैं। भगवती शारदा का मूलस्थान शशांक सदन अर्थात् अमृतमय प्रकाशपुंज है। जहाँ से वे अपने उपासकों के लिए निरंतर पचास अक्षरों के रूप में ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं।

उनका विग्रह शुद्ध ज्ञानमय, आनन्दमय है। उनका तेज दिव्य एवं अपरिमेय है और वे ही शब्दब्रह्म के रूप में स्तुती होती हैं। सृष्टिकाल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में जानी जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती है।
*आविर्बभूव तत्पश्चान्मुखतः परमात्मनः।*
*एका देवी शुक्लवर्णा वीणापुस्तकधारिणी।।*

वागाधिष्ठातृ देवी सा कवीमामिष्टदेवता।
सा च शक्तिः सृष्टिकाले पञ्चधा चेश्वरेच्छया।
राधा पद्मा च सावित्री दुर्गा देवी सरस्वती।।
वागाधिष्ठातृ या देवी शास्त्रज्ञानप्रदा सदा।
कृष्णकण्ठोद्भवा सा च या च देवी सरस्वती।।

सरस्वती देवी के ये नाम हैं प्रसिद्ध

दुर्गासप्तशती में भी आद्याशक्ति द्वारा अपने-आप को तीन भागों में विभक्त करने की कथा प्राप्त होती है। आद्याशक्ति के ये तीनों रूप महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के नाम से जगद्विख्यात हैं। देवी सरस्वती सत्वगुणसम्पन्ना हैं। इनके अनेक नाम हैं, जिनमें से वाक्, वाणी, गीः, गिरा, भाषा, शारदा, वाचा, धीश्वरी, वागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, सोमलता, वाग्देवी और वाग्देवता आदि अधिक प्रसिद्ध हैं।
भगवती सरस्वती विद्या की अधिष्ठातृ देवी हैं और विद्या को सभी धनों में प्रधान धन कहा गया है। विद्या से ही अमृत पान किया जा सकता है। भगवती सरस्वती की महिमा और प्रभाव असीम है। वे राष्ट्रिय भावना प्रदान करती हैं तथा लोकहित के लिए संघर्ष करती हैं। सृष्टि-निर्माण वाग्देवी का कार्य है। वे ही सारे संसार की निर्मात्री एवं अधीश्वरी हैं। वाग्देवी को प्रसन्न कर लेने पर मनुष्य संसार के सारे सुख भोगता है। इनके अनुग्रह से मनुष्य ज्ञानी, विज्ञानी, मेधावी, महर्षि और ब्रह्मर्षि हो जाता है। वाग्देवी सर्वत्र व्याप्त हैं तथापि वे निर्लेप-निरंजव एवं निष्काम हैं।
इस प्रकार अमित तेजस्विनी और अनन्त गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा एवं आराधना के लिए माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि निर्धारित की गई है। बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। अतः वागीश्वरी जयन्ती एवं श्रीपंचमी के नाम से भी इस तिथि की प्रसिद्धि है।

*जैन धर्म में बसंत पंचमी का अलग ही महत्व है*
जैन धर्म में लक्ष्मी का अर्थ होता हैं निर्वाण और सरस्वती का अर्थ होता है कैवल्यज्ञान। भगवान महावीर ने भी भौतिक ज्ञान नही अपितु आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का संसार को संदेश दिया। संसार मे रहते हुए भी हमें सयंम शील सत्य त्याग का अनुशरण करना चाहियें। जिससे हमारी आत्मा मोक्षगामी बन सकें

इस दिन कामदेव की भी होती है पूजा
कामदेव को प्रेम और काम का देवता माना गया है। कुछ लोग बसंत पंचमी के दिन कामदेव की पूजा करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार बसंत कामदेव के मित्र हैं। इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है।

ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक बसंत पंचमी का दिन अबूझ मुहर्त के तौर पर जाना जाता है और यही कारण है कि नए काम की शुरुआत के लिए सबसे अच्छा दिन माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करना भी शुभ होता है। इतना ही नहीं इस दिन पीले पकवान बनाना भी काफी अच्छा माना जाता है।

स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में मां सरस्वती की पूजा के साथ-साथ घरों में भी यह पूजा की जाती है। अगर आप घर में मां सरस्वती की पूजा कर रहे हैं तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें।
सुबह-सुबह नहाकर मां सरस्वती को पीले फूल अर्पित करें। इसके बाद पूजा के समय मां सरस्वती की वंदना करें। पूजा स्थान पर वाद्य यंत्र और किताबें रखें और बच्चों को भी पूजा स्थल पर बैठाएं। बच्चों को तोहफे में पुस्तक दें। इस दिन पीले चावल या पीले रंग का भोजन करें।

पूजा के दौरान सरस्वती माता का वंदना मंत्र
*शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं*
*वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।*
*हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् *
*वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्.*

*संकलन -संगीता बागरेचा (संगी)*

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