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Showing posts from June, 2018

मुक्ति कैसे हो.....?

*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *फंसी हूँ कषायों के जाल में,* *रहती हूँ राग-द्वैष,मोह-माया,* *छल-कपट से मालामाल में* *पर चाहिए मुक्ति हर हाल में ।*          *✒......संगी*    *🔹ज्ञानी हो और निंदा कथा विकथा कुतर्को मे फंसे हो तो मुक्ति कैसे हो??*         *♻ मात्र ज्ञानी होना मुक्ति के द्वार नहीं खोल सकता।* *♻ ज्ञानी हो और फिर भी निंदा ,कथा, विकथा और कुतर्को में फंसे हो तो मुक्ति  संभव ही नहीं  है और उस परिस्थिति में वो ज्ञानी कहलाने के योग्य भी नही होते।* *♻ ज्ञान पर मोह माया, मान- अपमान, काम क्रोध का आवरण चढ़ा हो तो मुक्ति संभव नहीं हो सकती।* *♻ हमारी मुक्ति में हमारे कर्म  मुख्यतः काम करते है। हम अपने ज्ञान का किस तरह उपयोग करते है यह बहुत कुछ निर्भर करता है निंदा, कथा, विकथाऔर कुतर्क आदि से जिनसे कर्म बंध ही होते है  और उसी से भव भम्रणा भी बढ़ती रहेगी।* ♻ इसको एक साधारण से उदाहरण से समझ सकते है :- माना कि मैं बहुत विद्वान हूँ बहुत सारे शास्त्रों का ज्ञान है किन्तु मुझे इस ज्ञान का घमण्ड है। मैं अपने आ...

मोको का ढूँढे रे बंदे.....

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *दिल से.............✍🏼* *मोको का ढूँढे रे बंदे.......*                *🙏संगी* *♻परमात्मा वितरागी के प्रेम को आप खोजना चाहते हो पर उसकी ओर सदा पीठ किए खङे रहते हो । भक्ति केवल पात्र को ही मिलता है अपात्र को नहीं, इसलिए प्रेम सदा पूछता है, "कौन" ?*  *♻आप स्नेह तो सभी से चाहते हो लेकिन उस स्नेह के योग्य नहीं बनते । इसी कारण जीवन बिन स्नेह सुख के रूखा रूखा ही बीत जाता है ।*  *♻आप चाहते तो हो कि स्नेह रूपी अमृत रस बरसे लेकिन पात्र तुम्हारा अमृत को संभालने योग्य नहीं है ।*  *♻चाहते विराट को हो लेकिन भीतर जगह क्षुुद्र के लिए भी नहीं है ।* *♻बुलाते परमात्मा को हो पर उसके लिए दिल में घर साधारण मेहमान का ही बनाया है ।*  ✒ *♻उसको चाहने से पहले अपने आप को तैयार तो करना ही पङेगा । अन्यथा हाथ मलने पड़ सकते हैं ।* *♻आप उसको पाने की विधियां पूछते हुए घूमते रहते हो । अगर विधि काम नहीं कर रही है तो निःसंदेह विधि गलत हैं ।* ♻कितनी मजेदार बातें है कि आप विधि बदलने को तैयार हो । शास्त्र बदलने को ...

युवा पीढ़ी के पतन का जिम्मेदार कौन?

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *सोचो समझो और जागो* *दिखता ये हरा भरा* *उजडा हुआ चमन है* *भोग लिप्सा में लिपटा*  *मानव का उठता हर कदम है* *सुनायी देता है संगी को* *दादा सबका ये रूदन है* *प्रेम करूणा का हो सबल* *इसी में सफल जनम है।।* 🙏🌹 *संगी*🌹🙏 *युवाओं का होता पतन, धार्मिक सामाजिक भारतीय संस्कृति का इंडियन पाश्चात्य संस्कृति में होता पलायन........जिम्मेदार कौन आप हम या युवा पीढ़ी⁉⁉* ♻शायद आज का लेख आप सभी को पढकर पसंद ना भी आए किंतु सत्य तो हमेशा से ही कडवे नीम की तरह ही रहा है।भले ही पहले कडवा फिर मिठास यहीं सत्य की तासीर है। खैर जाने दिजिए यहाँ हम बात कर रहे है ... *आज की पतनोन्मुख होती युवा पीढ़ी की........* ♻यहाँ कसूर या दोष कुछ अपवाद छोडकर युवाओं का रत्तीभर भी नही है वो जो बचपन से देख सुन रहे है उसी को तो follow कर रहे है। इसलिए ही आज की युवा पीढ़ी के पतन के लिए 100%हम जिम्मेदार है। अब आप कहेगे कैसे ??आइए इसे समझते है..... 👉एक नन्हा शिशु जब माता की कोख में अवतरण करता है तभी से हम जैसे उसे स्टार बना देंगे वैसे सपने देखते है बाते वैसी स्टाइल वैसा ही.... ♻ज...

निठावान और चापलूसी(चाटुकारिता)

*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *दुनिया इसी का नाम हैं* *चापलूसो का धाम हैं* *तेजपत्ता बनना या हरा धनिया* *ये विचारना आपका काम है* *दूज का चंदा बनना या पूनम का* *ये आपके हाथ है*                *✒संगी* *निष्ठा और चापलूसी(चाटुकारिता)* *♻Loyalty यानि निष्ठा और Sycophancy यानि चाटुकारिता दोनों ही शब्दों की बहुत ही सरल व्याख्या उदाहरण के साथ की गयी है लेकिन इन दोनों ही शब्दों  का हमारे जीवन मे बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान तो है ही दोनों ही शब्दों मे बहुत बड़ा अंतर भी है।* *♻निष्ठावान और चापलूसी दोनो ही परिवार ,संस्था समाज या किसी व्यक्ति के संदर्भ /जुडाव में होते है।* *♻निष्ठावान जिससे जुड़ा होता है।वहाँ वो केवल उस संस्था परिवार या व्यक्ति का हित देखता है भले ही इसके लिए उसका स्वयं  का अहित क्यों ना हो जाय ।वहीं  चाटुकार या चापलूस दिखावा तो निष्ठावान का करता है ।लेकिन जब उसके हित की बात आती है तो वह दूसरों का अहित करने मे एक पल भी नहीं सोचता हैं ।खुद बच निकलने में भलाई समझता है।इसके लिए और भी नाम है जैसे Broun-nosers,Teacher's pets ...

बात सच्ची पर कडवी

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *बात कडवी पर सच्ची....* बात कडवी जरूर है  किंतु है एकदम सच्ची, सुधारना है आपको, तो देने पड़ेंगे *चटके..* सोच भी अच्छी, काम भी अच्छे पर क्यों भाई  तुम मतवाद में  *अटके...* ओसवाल , पोरवाल  और ना जाने कौनसे वाल वीर की संतान हो, फिर क्यों पंथवाद में  *उलझे..* श्रावक तो उलझे  भटके मटके पर, क्यों हमारे संत महात्मा  भी संप्रदाय-संघाले में *भटके..*  दिल, दिमाग, दया ममत्व करूणा भी है, कहलाते जिनियस है  फिर क्यूँ चापलूसो के लेते *लटके...*  और तो और भौतिकता  दिखावे और मौज मस्ती  के छोटे बड़े सभी को है बड़े *चसके ....* आज तुम हो अल्पसंख्यक,  फूट अगर रहीं तो कल नहीं रहोगे नक्शे पर  फिर कहोंगे, सबको हम *खटके...* ना इधर ना ऊधर के रहोगे संगी फिर कहोगे आसमान से *टपके...* मत मतान्तर के चलते खजूर में  *अटके....* युग पुरूष जो बनना है, प्रभावना जिन शासन  की करना है तो..  काम करने पड़ेंगे *हटके...* वीर पथगामी हो, वीर गुण अपनाओ तुम, कदम बढाओ मिल के ...