मुक्ति कैसे हो.....?
*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *फंसी हूँ कषायों के जाल में,* *रहती हूँ राग-द्वैष,मोह-माया,* *छल-कपट से मालामाल में* *पर चाहिए मुक्ति हर हाल में ।* *✒......संगी* *🔹ज्ञानी हो और निंदा कथा विकथा कुतर्को मे फंसे हो तो मुक्ति कैसे हो??* *♻ मात्र ज्ञानी होना मुक्ति के द्वार नहीं खोल सकता।* *♻ ज्ञानी हो और फिर भी निंदा ,कथा, विकथा और कुतर्को में फंसे हो तो मुक्ति संभव ही नहीं है और उस परिस्थिति में वो ज्ञानी कहलाने के योग्य भी नही होते।* *♻ ज्ञान पर मोह माया, मान- अपमान, काम क्रोध का आवरण चढ़ा हो तो मुक्ति संभव नहीं हो सकती।* *♻ हमारी मुक्ति में हमारे कर्म मुख्यतः काम करते है। हम अपने ज्ञान का किस तरह उपयोग करते है यह बहुत कुछ निर्भर करता है निंदा, कथा, विकथाऔर कुतर्क आदि से जिनसे कर्म बंध ही होते है और उसी से भव भम्रणा भी बढ़ती रहेगी।* ♻ इसको एक साधारण से उदाहरण से समझ सकते है :- माना कि मैं बहुत विद्वान हूँ बहुत सारे शास्त्रों का ज्ञान है किन्तु मुझे इस ज्ञान का घमण्ड है। मैं अपने आ...