ज्ञान की आशातना विराधना से कैसे बचें? ?
*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *🤔सोचो,समझो और जागो....* *ज्ञान की आशातना,विराधना से कैसे बचें⁉* *संगी* *♻ज्ञानावरणीय कर्म : इस कर्म के उदय मे आने से जीव के ज्ञान गुण पर एक आवरण सा छा जाता है जीव की बुद्धि,स्मृति,पढने लिखने की शक्ति ,निर्णय करने की शक्ति,निरीक्षण करने की शक्तिकुण्ठित या लुप्त प्राय हो जाती है !वह सीखना चाह कर भी सीख नही पाता और सीखा हुआ भी भूल जाता है।* *♻ ज्ञान की आशातना करने से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है सभी जानते है। इसलिए.......* *♻ज्ञान की जयणा करें ।* *ज्ञान की आशातना,विराधना करने से ज्ञानावरणीय कर्म बंध होता है, जिससे हमारी आत्मा मंदबुद्धि, अज्ञानता आदि दुषणों का शिकार होती है।* *♻ यह कर्म बंध अंततः केवलज्ञान प्रकाश की पूर्ण प्राप्ति में अंतराय रूप बनता है। इसलिये हमें ज्ञान की आशातना/विराधना से बचना चाहिये।* *♻झूठे मुँह नही बोले।यदि बोलना आवश्यक हो तो पानी से मुँह साफ करके ही बोलना चाहिये।* *♻पुस्तकों,अख़बार, लिखा हुआ कागज,उसके टुकड़ो पर...