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Showing posts from May, 2018

ज्ञान की आशातना विराधना से कैसे बचें? ?

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *🤔सोचो,समझो और जागो....* *ज्ञान की आशातना,विराधना से कैसे बचें⁉*                              *संगी* *♻ज्ञानावरणीय कर्म : इस कर्म के उदय मे आने से जीव के ज्ञान गुण पर एक आवरण सा छा जाता है जीव की बुद्धि,स्मृति,पढने लिखने की शक्ति ,निर्णय करने की शक्ति,निरीक्षण करने की शक्तिकुण्ठित या लुप्त प्राय हो जाती है !वह सीखना चाह कर भी सीख नही पाता और सीखा हुआ भी भूल जाता है।* *♻ ज्ञान की आशातना करने से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है सभी जानते है। इसलिए.......*  *♻ज्ञान की जयणा करें ।* *ज्ञान की आशातना,विराधना करने से ज्ञानावरणीय कर्म बंध होता है, जिससे हमारी आत्मा मंदबुद्धि, अज्ञानता आदि दुषणों का शिकार होती है।* *♻ यह कर्म बंध अंततः केवलज्ञान प्रकाश की पूर्ण प्राप्ति में अंतराय रूप बनता है। इसलिये हमें ज्ञान की आशातना/विराधना से बचना चाहिये।* *♻झूठे मुँह नही बोले।यदि बोलना आवश्यक हो तो पानी से मुँह साफ करके ही बोलना चाहिये।* *♻पुस्तकों,अख़बार, लिखा हुआ कागज,उसके टुकड़ो पर...

अगर मुझे संयम मिलता.......

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*||श्री नाकोड़ाजी ||* *अगर मुझे संयम मिलता तो.........🙏* *♻संसार से मुक्त होने का भाव है संयम,* *♻कषायों को निश्चय पूर्वक रोकना है संयम।* *♻संसार से मुक्त होने का भाव है संयम ।* *♻सिद्ध स्वरूप पाने का शाश्वत मार्ग है संयम।* ♻हम कई बार सोचते है अरे ऐसा होता तो ये होता वैसा होता तो ये होता कहने का तात्पर्य  है कि मानव मन चंचल होता है और हर समय कुछ ना कुछ सोचता रहता है इसी प्रकार सोचते सोचते ये ख्याल आया कि अगर मुझे संयम मिलता तो ....... कैसा होता? क्या होता? और मै क्या करती....? यही सब विचार मै आपके समक्ष रखने जा रही हूँ? *♻सर्व प्रथम तो संयम है क्या है ये जानते है वैसे तो संयम शब्द ही अपने आप में व्यापक अर्थ लिए हुए है लेकिन हम इसे कम से कम शब्दों में समझने की कोशिश करेंगे ।* *♻ज्ञानी गुरूभगवंत फरमाते है कि,* *संयम का अर्थ है एक सशक्त सहारे के साथ हल्का सा बंधन ।* *यह बंधन निर्बंध करता है ।* *आज तो हम बिना ब्रेक की गाड़ी में नीचे जाते हुये भी आँखें मींचे हुये बैठे हैं ।* *क्या ब्रेक रूपी संयम के बिना जीवन की गाड़ी सुरक्षित रह पायेगी ?*  *बिल्कुल नह...

कोमल हूँ कमजोर नहीं

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *कोमल हूँ कमजोर नहीं.......* *गिरती पड़ती संभलती हूँ,* *कोमल हू कमजोर नहीं .....* *तपते मरूस्थल में भी* *कदम आगे बढ़ाती हूँ* *जीवन के तुफानो से* *हर पल टकराती हूँ* *कोमल हू कमजोर नहीं ......* *कहीं हार ना जाऊँ* *इसलिए लडती हूँ* *विपरित परिस्थितियों में* *जीत का हौसला रखती हूँ* *कोमल हूँ कमजोर नहीं ........* *दर्द और मीठी चुभन से*  *सुबह शाम गुजरती हूँ* *निराशा के अंधकार में* *उम्मीद की लौ जलाती हूँ* *कोमल हूँ कमजोर नहीं.......* *कुछ करने की चाहत में* *जीवन में संघर्ष करती हूँ* *राह कितनी हो कठिन* *सत्य को ही चुनती हूँ* *कोमल हूँ कमजोर नहीं......* *जीवन का सीधा गणित* *सादगी से समझाती हूँ*  *संगी मान दो, मान लो,* *आत्मसम्मान को चुनती हूँ ।।* *कोमल हूँ कमजोर नहीं......* *🙏🌹संगीता बागरेचा🌹🙏*

चेहरे से पहले चरित्र संवारे.....

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*|| श्री नाकोड़ाजी ||*  *😊चेहरे से पहले चरित्र संवारे*         *संगी* ♻ *जीवन परमात्मा से मिला आशिर्वाद है इसे शांति  से जीना या अंशाति से ,अवसाद में जीना या आनंद में यह हम पर निर्भर  है ।* ♻ *हमारा रंग कैसा है यह महत्वपूर्ण नहीहै।जीवन को कैसे जीना उस पर ध्यान दे।* ♻ *चेहरे को कितना ही चमका लो,दूसरे दिन वह पहले जैसा ही हो जाएगा पर मन को थोड़ा चमका लिया तो पूरी जिद॔गी चमक जाएँगी ।* ♻ *जीवन मैं  परिस्थितियाँ सदैव एक सी नही रहती फिर भी जो परिस्थिति बिगडने पर मनोस्थिति बिगडने नही देता वह सदा खुश रहता है,याद रखे दूध फटने पर वे ही लोग दुखी होते है जिन्हें  रसगुल्ला बनाना नहीं आता।* ♻ *आज कुंवारा भी दुखी है और शादीशुदा भी।शादीशुदा गुस्सेल पत्नी से और कुंवारा शादी न होने से दुखी है।* ♻ *परंतु जो हर स्थिति को परमात्मा के प्रसाद की तरह स्वीकार करता है,उसका जीवन स्वतः शानदार बन जाता है।* ♻ *चिंता, क्रोध और ईष्या जीवन के तीन शत्रु है ।चिंता दिल को,क्रोध  दिमाग को,और ईष्या संबधों को नष्ट कर देती है।* ♻  *जब अनहोनी को क...

मै पुरूष हूँ ...........

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*🌹मै पुरूष हूँ।🌹* *प्यार का एहसास है*  *मन में कोमल भाव है* *मै पुरूष हूँ भावनाएँ* *व्यक्त करना नही आता है।* *बेटा-भाई मामा-चाचा*  *ताऊ पति-पिता भी हूँ* *जिम्मेदारियो के बोझ तले* *दबा मन बडा घबराता है* *मै पुरूष हूँ .........* *विचार कई आते जाते मन मे* *चेहरे से मगर दिखा नहीं पाता हूँ* *विश्व पटल पर चकडोल सा* *डोलता झूलता नजर आता हूँ* *मै पुरूष हूँ ..........* *माता-पिता की उम्मीदों पर* *कभी खरा नही उतर पाता हूँ* *तो बुरा लगता है पर नहीं* *जता-बता पाता हूँ ।* *मैं पुरूष हूँ ....* *पत्नी को भी होती होगी* *सहारे की मेरी जरूरत* *बुरा लगता है जब* *सहारा नहीं दे पाता हूँ ।* *मैं पुरूष हूँ ....* *बच्चे भी तो चाहते होंगे* *खेलना पढना और घूमना* *पर समय नहीं दे पाता तब* *स्व को मजबूर बहुत पाता हूँ* *मैं पुरूष हूँ ....* *माँ-पत्नी की महाभारत में* *खुद को उलझा पाता हूँ* *पक्ष किसी का नही ले पाता* *बेबस-लाचार स्व को पाता हूँ*  *मैं पुरूष हूँ ....* *बिमार हो कोई भी बच्चे बुढे* *ठिक होने तक दिमाग वहीं दौडाता हूँ* *शिकन चिंता की फि...
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 *सोचो समझो और जागो* 🤔💲💱💲 *.....अब और सहा नहीं जाता,* *....और कुछ कहा नहीं जाता,* *कब तक हमारा समाज रहेगा नारी जाति के प्रति संज्ञा शून्य* *और किसी का तो पता नहीं मगर अपनी हवस मिटाने महिलाओं बच्चियों से रेप करने वालों का सचमुच कोई धर्म नहीं होता* *बलात्कारी नरपिशाच, नराधम किसी जाति धर्म कौम से संबधित नही* *इन हैवानों का नहीं होता दिन ईमान कोई* *कैसे होंगे नर पिशाच वो जिनमे बचा न एहसास कोई* *या भूल गए उनके घर भी होगी बेटी कोई* *समाज कहता हैं देवी का रूप लड़कियों को, फिर कैसे होता  अन्याय यहीं.......*या लडकी होना ही बन जाता  अभिशाप कोई* *मिल गया है अवसर इन चाटुकारो को कर रहा है* *धर्म और जाति के नाम राजनीति हर कोई* *केंडल मार्च निकाल सभाए भरेगे या बंद का ऐलान भी करेगे* *उसके बाद क्या...⁉क्या सही में  बलात्कार रोक पाएगे कोई*⁉ *नहीं क्योंकि हर पल हर क्षण किसी न किसी के साथ तो बलात्कार तो हो ही रहा है कही शारीरिक तो कही मानसिक........*कही घटनाए नजर में आती है कही कई वर्षो तक यौन शोषण होता ही रहता है और अंदर ही अंदर मामलों को दबा दिया जात...

धर्म से सुख और अधर्म सेदु:ख तो वर्तमान मे कई धर्मी व्यक्ति भी दुखी क्यों .......

*|| श्री नाकोड़ाजी ||* *सोचो,समझो और जागो*             *♻धर्म से सुख और अधर्म से दुःख*यह शास्त्रीय वचन है तो फिर *वर्तमान मे कई धर्मी व्यक्ति भी दुखी क्यों दिखाई देते है* .................⁉ ♻ *सुख-दुःख दोनों मे जीव स्वयंभू है।* *♻धर्म का प्रत्यक्ष फल सुख नहीं हैं, बल्कि धर्म करने से पुण्य का बंध होता है और उस पुण्य के उदय से सुख की प्राप्ति  होती है।उसी प्रकार अधर्म से तत्काल दुःख की प्राप्ति  न होकरअधर्म  से पाप का बंध होता हैं और उस पाप कर्म के उदय से दुःख की प्राप्ति  होती है।* *♻कर्म बंध के साथ ही उसकी स्थिति का भी बंध होता है वह कर्म अबाधा काल पुर्ण होने बाद ही उदय में आता हैं ।और अंतत  जैसा हमारे कर्मों का बंध होता है वैसा ही फल हमे मिलता है।* ♻ *जीव को अपने कर्म का रस चखना ही पडता है।* *♻संसार में रहकर सब धन या जन से समान नहीं रह सकते है,*क्योंकि सबके कार्य पृथक-पृथक है सबकी भावना भिन्न-भिन्न तदनुरूप उनके कर्म का बंध होता है और उसका फल उनको अवश्य भोगना पडता है।* इसको हम इस उदाहरण से भी समझ सकते है कि-* ♻एक ही...
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🙏😌 *मृगतृष्णा*😌🙏 ये कैसी मृगतृष्णा?  जिसे मै ना बुझा पाऊ इधर जाऊँ उधर जाऊँ मन बड़ा ललचाऊ चंचल चित्त भागे किधर स्थिर ना रह पाऊ गाड़ी हो बंगला हो धन-दौलत का ढगला हो सब कुछ पा जाऊँ फिर भी तृष्णा न बुझा पाऊ नाम हो शोहरत हो मुझसे ना कोई बड़ा हो ऐसी ही भावना भाऊ साम,दाम, दण्ड, भेद हर नीति अपनाऊ फिर भी तृष्णा न बुझा पाऊ काम,क्रोध, मान,माया इनमें ही घिरी रह जाऊ मैं ,मैं, मैं और मैं बस इसके आगे  न कुछ देख पाऊ फिर भी तृष्णा न बुझा पाऊ.......... दौड़ते-दौड़ते एक दिन ठोकर से मै गिर जाऊँ उठाने सामने......  संत एक निराला पाऊ ना चिंता, ना फिकर ललाट पर तेज असीम पाऊ शांत चित्त,निस्पृह हर इच्छा से परहित मे ही रमता पाऊ मान नहीं ,मोह नहीं कषायों से कोषों दूर पाऊ.. रखा जो उनने हाथ सर पर हर तृष्णा से स्व को मुक्त पाऊ हर तृष्णा से स्व को मुक्त पाऊ और मुक्ति पुरी को वर लाऊ ना कुछ तेरा, ना कुछ मेरा छोड़  सब यहां, मे जाऊ फिर काहे करे मनवा इतना सब झमेला छोड़ सब यहां, मै जाऊ बात इतनी *संगी* ने समझी, अब मै तुमको भी समझाऊ तुम जो समझो तो.........